भारतीय रेसलिंग के 5 बेहद ख़ास लम्हे, जब कुश्ती को मिली नई पहचान

By   - 16/11/2020

आज हम आपको भारतीय रेसलिंग की कहानियों की तिजोरी से 5 ऐसे कहानियों से रूबरू कराने जा रहे है जहा पर भारतीय पहलवानों ने देश का मान सम्मान बढ़ाया और देश की कुश्ती का परचम इंटरनेशनल लेवल पर लहराया। किसी ने देश के लिए दिग्गज पहलवान बनाएं और किसी ने देश के लिए ओलंपिक मैडल जीतकर भरोसा जताया के वो भी ओलंपिक में जाकर देश के लिए मैडल जीत सकते है।

1. भारतीय पहलवानी के पितामाह से, जिनकी लाठी ने दिए देश को कई दिग्गज पहलवान
गुरु हनुमान भारत के महान कुश्ती कोच और पहलवान थे उन्‍होंने पुरे वर्ल्ड में भारतीय कुश्‍ती को महत्त्वपूर्ण स्‍थान दिलाया। भारतीय कुश्‍ती के पितामाह माने जाने वाले गुरु हनुमान यानी विजय पाल गुरुओं के गुरु थे। समय के साथ उन्‍होंने लगभग सभी फ्री स्‍टाइल इंटरनेशनल पहलवानों को कोचिंग दी और जो गुरु हनुमान के शिष्‍य थे, वें आज खुद गुरु बनकर भारतीय कुश्‍ती को अधिक ऊंचाईयों तक लेकर जा रहे हैं। बतौर खिलाड़ी और कोच गुरु हनुमान दिग्‍गज थे। भारतीय कुश्‍ती में उनके योगदान के कारण उन्‍हें पितामाह कहा जाता है। दो बार के ओलंपिक मेडलिस्‍ट सुशील कुमार के गुरु सतपाल सिंह उनके शिष्‍य थे। उनकी कुश्‍ती के क्षेत्र में उपलब्धियों के कारण साल1987 में द्रोणाचार्य पुरस्कार और साल 1983 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

रेसलिंग का सफर
गुरु हनुमान का जन्म राजस्थान के झुंझुनू ज़िला के चिड़ावा तहसील में 1901 में हुआ था। गुरु हनुमान का बचपन का नाम विजय पाल था। बचपन में कमज़ोर सेहत का होने के कारण अक्सर ताक़तवर लड़के इन्हें तंग करते थे। इसलिए उन्होंने सेहत बनाने के लिए बचपन में ही पहलवानी को अपना लिया था। कुश्ती के प्रति अपनी लगन और प्रेम के चलते 20 साल की उम्र में दिल्ली आ गए । भगवान हनुमान से प्रेरित होकर इन्होंने अपना नाम हनुमान रख लिया और ताउम्र ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया। उनके अनुसार उनकी शादी तो कुश्ती से हो चुकी थी। कुश्ती के प्रति उनकी लगन के चलते मशहूर भारतीय उद्योगपति के.के बिरला ने उन्हें दिल्ली में अखाडा चलने के लिए ज़मीन दान में दी थी। साल 1940 में वो आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। 1947 के बाद हनुमान अखाडा दिल्ली पहलवानों का मंदिर हो गया था।

मेहनत कराने का तरीका
अभ्‍यास में सुबह 4 बजे उठकर सबसे पहले दौड़, फिर इसके बाद बाउट का अभ्‍यास, किसी के गिरने से पहले पहले कम से कम 30 मिनट तक मुकाबला, इसके अलावा रस्सियों पर चढ़ना, 100 पुशअप ये सब तब करना होता अभ्‍यास में शामिल थे। और ये सब गुरुजी के दोपहर के खाने के फैसले तक करना होता था।

गुरूजी की लाठी का कमाल
उन्होंने भारतीय स्टाइल और अन्तराष्ट्रीय स्टाइल दोनों प्रकार की कुश्ती-शैलियों का आपस में योग कराकर अनेकों एशियाई चैम्पियन भारतवर्ष को दिये। पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखाने के लिये उनकी लाठी कुश्ती के अखाड़े में काफी मशहूर थी। इसी लाठी के चलते सतपाल, करतार सिंह, ओलम्पियन प्रेमनाथ, सैफ विजेता वीरेन्दर ठाकरान (धीरज पहलवान), सुभाष पहलवान, हंसराम पहलवान जैसे अनगिनत पहलवान कुश्ती की मिसाल बने। ये उनकी लाठी का ही कमाल था जो अखाड़े के पहलवानों को 3 बजे ही कसरत करने के लिये जगा देती थी।

गुरु के दिग्गज शिष्
उनके तीन में से दो शिष्‍य सुदेश कुमार और प्रेम नाथ ने 1958 कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में गोल्‍ड मेडल जीता था। जबकि बाकी शिष्‍य सतपाल सिंह और करतार सिंह ने 1982 और 1986 में एशियन गेम्‍स में गोल्‍ड मेडल जीता। गुरु हनुमान के 8 शिष्‍यों में सर्वोच्च भारतीय खेल सम्मान अजुर्न अवॉर्ड से भी नवाजा गया।

2. द्रोणाचार्य गुरु महाबली सतपाल के करियर का वो मैडल जिसने बदल दी उनकी ज़िंदगी
भारत के दिग्गज पहलवान महाबली सतपाल ने वैसे तो अपने करियर में कई मैडल और अवार्ड्स हासिल किए लेकिन उनके लिए बेहद खास मैडल था 1982 एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीतना। इस मैडल ने उनके करियर और जिंदगी को बदल दिया और उनकी कुश्ती को नई ऊंचाईया दी। सतपाल ने उनके गोल्ड मैडल की यादें अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर की और लिखा ” मेरी ज़िन्दगी के सबसे यादगार पल – 1982 एशियाई खेल दिल्ली – अंबेडकर स्टेडियम मे जब अपने देशवासियों के सामने गोल्ड मैडल जीता था”

1982 में एशियाई चैंपियनशिप नई दिल्ली में अंबेडकर स्टेडियम में थी। इसमें भारतीय टीम को 4 मैडल के मिले जिसमे चोट के बावजूद महाबली सतपाल के ज़ोरदार खेल ने भारत को गोल्ड मैडल दिलाया।

“1982 में हम अपने देश में खेल रहे थे और कुश्ती के मैच नई दिल्ली में अंबेडकर स्टेडियम में थे। मैंने स्वर्ण पदक जीत लिया था लेकिन मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि यह पदक मेरे करियर और जिंदगी दोनों को बदल देगा। इस पदक के आने के बाद मेरा करियर, मेरी जिंदगी सब कुछ बदल गई। यह पदक मेरी कुश्ती को नई ऊंचाईयों पर ले गया। यह मेरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। गेम्स के दौरान मेरे दायें घुटने के लिंगामेंट में चोट लग गई थी और सभी यह मान रहे थे कि सतपाल नहीं खेलेगा। मेरे गुरु हनुमान जी ने भी मना कर दिया लेकिन मैं यह मौका नहीं छोड़ना चाहता था क्योंकि हम अपने घर में खेल रहे थे और यहां सभी की उम्मीदें मुझसे जुड़ी थी। मैं टीम का कप्तान था और अन्य पहलवान हार चुके थे। अब बस सब यहीं चाह रहे थे कि एक स्वर्ण तो आना चाहिए। मुझे अंदर से लग रहा था कि मैं स्वर्ण पदक जीत सकता हूं”।

गोल्ड मैडल जीतने से पहले महाबली ने ईरान, जापान और कोरिया के पहलवानों को हराया और फिर मंगोलिया के पहलवान के साथ फाइनल में पहुंचे। मंगोलिया का पहलवान गंतोक अच्छा था लेकिन महाबली ने बाज़ी मर ली और देश वासियों की उम्मीदो पर ख़रे उतरे।

इस मैडल ने महाबली सतपाल को एक नई पहचान दी और इस जीत का जशन पूरी दिल्ली ने मनाया। “पूरी दिल्ली जश्न मना रही थी। घोड़े और तांगे पर मुझे घुमाते रहे। दो लाख लोगों ने बवाना में मेरा स्वागत किया। मैंने लगातार तीन पदक एशियन गेम्स में जीते थे। तेहरान में 1974 में कांस्य, 1978 बैंकॉक में रजत और फिर स्वर्ण अपने नाम किया था”।

3. वो मैच जिसके बाद बदली भारतीय रेसलिंग की तस्वीर, देश को मिले कई होनहार पहलवान
सुशील कुमार पहले ऐसे भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्‍होंने दो ओलंपिक मेडल जीते हैं। उनके नाम सिल्‍वर और ब्रॉन्‍ज मेडल हैं। यह मेडल उन्‍होंने दो लगातार ओलंपिक में जीते थे। 2008 बीजिंग ओलंपिक खेलों में उन्‍होंने ब्रोंज मैडल जीता था और 2012 में लंदन ओलंपिक में सिल्‍वर मेडल अपने नाम किया था। रेसलिंग में ओलंपिक में पदक जीतने वाले दूसरे पहलवान हैं। उनसे पहले केडी जाधव ने 1952 के खेलों में कांस्‍य पदक जीता था। बीजिंग ओलंपिक का सुशील कुमार का कांस्‍य पदक का वो मुकाबला जिसके बाद भारतीय रेसलिंग की तस्वीर हमेशा के लिए बदलने वाली थी यह शायद ही, किसी को पता होगा और यह कारनामा सुशील ने 20 अगस्‍त 2008 को लियोनिड स्पिरिडोनोव को 3-1 से हरा कर किया। सुशील के मैडल ने भारतीय रेसलिंग को फिर से खड़ा करने में एक महत्पूर्ण भूमिका निभाई थी। आप कह सकते है रेसलिंग को उसका दर्जा जो था वो वापस दिलवाया।

बीजिंग ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार के ब्रोंज मैडल के बाद सभी पहलवानों को कॉन्फिडेंस मिला के वो भी देश के लिए मैडल जीत सकते है। और यह कारनामा फिर से सुशील ने लंदन ओलंपिक में सिल्वर मैडल जीत कर दोहराया और इस बार उन्होंने अकेले इस मैडल को नहीं जीता था उनकी साथ योगेश्वर दत्त ने भी ब्रोंज मैडल जीत देश का मान बढ़ाया।

दोनों पहलवानों के मैडल ने युवा बच्चों को पहलवानी करने की प्रेरणा दी और सभी में यह विश्वास जताया के वो भी ओलंपिक में मैडल जीत सकते है। साक्षी मालिक भी दोनों पहलवानों से प्रेरित होकर देश को रिओ ओलंपिक में ब्रोंज मैडल दिला चुकी है उनका मानना है सुशील और योगेश्वर के ओलंपिक मैडल ने उन्हें काफी मोटीवेट किया था। उन्ही की तरह वो भी देश के लिए मैडल जीतना चाहती थी।

“जब मेने रेसलिंग स्टार्ट की थी और जूनियर लेवल पर मैडल जीतने स्टार्ट किए तो ओलंपिक मैडल जीतने के लिए मुझे पहलवान सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त के मैडल से काफी मोटिवेशन मिला था” साक्षी ने कहा।

अर्जुन अवार्डी कोच कृपा शंकर ने बताया कैसे पहलवान सुशील कुमार के मैडल से भारतीय रेसलिंग को प्रोत्साहन मिला साथ ही पहलवानो में एक ऊर्जा का संचार हुआ के वो भी ओलंपिक में मैडल जीत सकते है। इतना ही शंकर बताते है के इससे रेस्टलेर्स को रोज़गार भी मिले।

बीजिंग के मैडल के बाद सुशील हर न्यूज़ चैनल्स और न्यूज़ पेपर के हैडलाइन थे। उनकी वजह से ही भारतीय रेसलिंग का स्तर आगे बढ़ पाया।
भारतीय रेसलर को यह कॉन्फिडेंस आया के हम भी ओलिंपिक में मैडल जीत सकते है। पहलवानों की सोच बदली और नयी ऊर्जा का संचार हुआ। शंकर आगे बताते है “आज जो हम कही पर जा कर रेसलिंग की कमेंटरी करते है यह सब सुशील के उस मैडल का नतीजा है। पहलवान जब अच्छा करते है तो खेल आगे बढ़ता है फिर इस से रेसलिंग से जुड़े लोगो को रोजगार भी मिलता है” कृपा शंकर बिश्नोई ने बताया।

4. कहानी ऐसे पहलवान की जिसने 12 साल की उम्र में जीता इंटरनेशनल गोल्ड मैडल और फिर रचा इतिहास
रेसलर योगेश्वर दत्त भारत के तीसरे ऐसे पहलवान हैं जिन्होंने ओलंपिक में देश का नाम गौरांवित किया है। दत्त हरियाणा के सोनीपत ज़िले के एक छोटे से गांव बैंसवाल कलां से ताल्लुक़ रखते है। लोग ओलिंपिक मेडलिस्ट को प्यार से ‘योगी’ या फिर ‘पहलवान जी’ के नाम से बुलाते है। योगेश्वर दत्त के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही लंदन 2012 ओलंपिक में देश के लिए ब्रॉन्ज़ मेडल जीतना। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उनकी काफी मेहनत छुपी हुई है।

रेसलिंग की शुरुआत
योगेश्वर दत्त का रेसलिंग से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। उनके माता-पिता पेशे से स्कूल टीचर थे और वह चाहते थे कि उन्हीं की तरह उनका बेटा भी एक टीचर बने। लेकिन उस समय उनके गांव के एक मशहूर पहलवान बलराज के कारनामों ने उन्हें रेसलिंग की ओर आकर्षित किया। शुरुआत में उनके माता-पिता रेसलिंग के खिलाफ थे लेकिन जब उनके बेटे ने स्कूल और गांव में कुश्ती प्रतियोगिताओं के ज़रिए नाम कमाना शुरू किया तो उनका नज़रिया भी बदलने लगा।

12 साल की उम्र में जीता इंटरनेशनल गोल्ड मैडल
पहलवान दत्त जब 12 बरस के थे तब पोलैंड में होने वाले इंटरनेशनल कैडेट गेम्स में खेलने के लिए उनको चुना गया। इस इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपने आत्मविश्वास और उम्मीदों को एक नई दिशा दी। दो साल के बाद रेसलिंग की बेहतर ट्रेनिंग लेने के लिए वह अपने परिवार को छोड़कर नई दिल्ली चले गए। जहां छत्रसाल स्टेडियम में उन्होंने कुश्ती के गुर, गुरु सतपाल सिखने स्टार्ट किए।

करियर का अहम मोड़
योगेश्वर के रेसलिंग करियर में एक अहम मोड़ तब आया जब उन्होंने साल 2003 में लंदन में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। फिर साल 2006 में उन्होंने दोहा में हुए एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। इसके बाद योगेश्वर ने अगले साल ही कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप और साल 2008 में एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल हासिल करके रेसलिंग की दुनिया में अपना दम दिखाते हुए 2008 में होने वाले बीजिंग ओलंपिक में 60 किलोग्राम भारवर्ग कुश्ती के लिए क्वालिफाई किया। हालांकि बीजिंग ओलंपिक में उनका सफर कुछ ख़ास नहीं रहा लेकिन अपनी असफलताओं से सीख लेते हुए वह आगे बढ़े और मेडल जीतने की अपनी भूख को उन्होंने बरक़रार रखा।

देश को थी ओलंपिक मैडल की उम्मीद
साल 2010 में जब भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया गया तो पूरे भारतवासियों को योगेश्वर से काफी उम्मीदें थीं। इस दबाव के बावजूद यह पहलवान देशवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरा और 60 किलोग्राम भारवर्ग में सोने का तमगा अपने नाम किया। इसके बाद उनसे उम्मीदें और बढ़ गईं। बढ़ी उम्मीदों के बोझ के साथ अब उनका अगला लक्ष्य था साल 2012 में होने वाला लंदन ओलंपिक।

लंदन ओलंपिक में मेडल जीतना उनके कुश्ती करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। 12 अगस्त 2012 को उन्होंने मेन्स फ्रीस्टाइल 60 किलोग्राम भारवर्ग में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। उस समय ओलंपिक में भारत की तरफ से मेडल जीतने वाले वह तीसरे रेसलर बने। उनसे पहले यह कारनामा सिर्फ केडी जाधव (1952) और सुशील कुमार (2008, 2012) ने किया था।

2016 ओलिंपिक के बाद लिया संन्यास
साल 2016 में हुए रियो ओलंपिक में योगेश्वर का सफर भुलाने वाला रहा। ओलंपिक में उनके एक और मेडल जीतने की उम्मीदें उस समय टूट गई जब वह पहले राउंड में ही हार कर बाहर हो गए। इसके बाद उन्होंने कुश्ती से संन्यास ले लिया और कोचिंग देना स्टार्ट किया। योगेश्वर हरियाणा के सोनीपत में अपनी रेसलिंग अकादमी भी चला रहे हैं जहां वह युवा पीढ़ी के हीरो को तराशने का काम रहे हैं।

योगेश्वर दत्त जैसे दिग्गज रेसलर ने खेल की दुनिया में हमारे देश का नाम रोशन तो किया ही है इसके साथ ही साथ वह युवा पीढ़ी को कुश्ती में अपना करियर बनाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।

  1. मिलिए भारत के पहले अर्जुन अवार्डी और पहले वर्ल्ड मेडलिस्ट पहलवान से
    महान पहलवान उदयचंद का जन्म हरियाणा के हिसार के पास एक छोटे से गॉव जाण्डली मे हुआ था । बचपन से ही उदयचंद कुश्ती के शौकीन थे । अपने भाई हरिराम के साथ उदय चंद प्रैक्टिस करते थे । भारतीय सेना मे भर्ती होने के बाद उदय चंद के सपने आसमान छूने लगे थे । 1958 से 1970 तक लगातार 12 वर्षो तक राष्ट्रीय चैंपियन रहे, जो आज भी एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड है।

    आजाद भारत के पहले वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडलिस्ट
    पहलवान उदयचंद के कैरियर की शुरुआत ही उस समय हुई थी जिस समय खेलो की हालत बहुत खराब थी। जीतने पर भी कोई नही पहुँचता था । देश मे खेल संघों के अध्यक्ष उद्योगपति होते थे । लेकिन खिलाड़ी एक-एक पैसे के मोहताज हुआ करते थे । पहलवान उदयचन्द कुश्ती जगत का वो कोहिनूर है जिन्होंने योकोहामा 1961 में हुई वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रोंज मैडल जीता था। पहलवान उदय चंद आजाद भारत के पहले व्यक्तिगत वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप के पदक विजेता है। पहलवान उदय चंद जी अपने भाई हरिराम के साथ विश्व चैंपियनशिप मे हिस्सा लेने साथ गये थे भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार था कि एक मॉ के दो बेटे विश्व चैंपियनशिप मे गये हो।

    पहलवान उदय ने वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप के अपने अनुभव के बारे में कहा, “उस समय बहुत खुशी हुई थी। भारत मां के दो सपूत पहली बार विश्व चैंपियनशिप में गए थे। बड़े भाई का नाम था हरिराम। हम दोनों भाई गए थे और यह मेरे लिए बेहद खास था।”

    तीन बार ओलंपिक का हिस्सा बने  
    उदय चन्द जी ने तीन ओलिम्पक मे भाग लिया रोम 1960 , टोक्यो 1964 , मैक्सिको सिटी 1968 और यहाँ वो 6 पोजीशन पर रहे। उदय चन्द जी ने एशियाई खेलों में दो बार भाग लिया 1962 के एशियाई खेलों जकार्ता में 70 किलो ग्रेको रोमन में दो रजत पदक जीते और 1966 एशियाई खेलों बैंकाक में 70 किलो फ्रीस्टाइल में कांस्य पदक जीता। इसके अलावा उन्होंने चार अलग-अलग विश्व कुश्ती चैंपियनशिप यानी योकोहामा 1961, मैनचेस्टर 1965, दिल्ली 1967 और एडमोंटन 1970 में भाग लिया। उन्होंने स्कॉटलैंड के एडिनबर्गए 1970 में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक के साथ अपने शानदार कैरियर को चार चॉद लगा दिये।

    1970 में पूरा हुआ गोल्ड मैडल का सपना
    पहलवान उदय का गोल्ड मैडल का सपना 1970 में तब पूरा हुआ, जब एडिनबर्ग में हुए राष्ट्रमंडल खेलों की लाइटवेट कुश्ती स्पर्धा में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और देश का नाम रौशन किया। इस से पहले उन्होंने जकार्ता में 1962 में हुए एशियाई खेलों के ग्रीको रोमन व फ्री स्टाइल दोनों स्पर्धाओं में उन्होंने रजत पदक जीता और भारतीय टीम का नेतृत्व किया। इसके बाद बैंकॉक में 1966 में हुए एशियाई खेलों की फ्रीस्टाइल कुश्ती में उन्होंने कांस्य पदक जीता।

    कुश्ती के पहले अर्जुन अवार्डी
    उदयचंद की उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1961 में कुश्ती में देश का पहला अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया। अर्जुन पुरस्कार की स्थापना 1961 में ही हुई थी।

    तीन बार मास्टर चंदगी राम से हुई कुश्ती
    पहलवान उदयचन्द तीन बार मास्टर चंदगी राम के आमने सामने थे लेकिन कुश्ती का कभी कोई परिणाम नही निकल सका और कुश्ती  बराबरी पर रही।

 

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