मिलिए झज्जर गांव के ‘केतली पहलवान’ से, जिससे देश को है ओलंपिक मैडल की उम्मीद

By   - 08/08/2020

वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश को सिल्वर मैडल दिलाने वाले पहलवान दीपक पूनिया आज अपने भार 86 किलो में वर्ल्ड के नंबर 2 पहलवान है। दीपक ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में मैडल के साथ भारत के लिए ओलंपिक कोटा भी प्राप्त किया। देश को अब उनसे टोक्यो ओलंपिक में मैडल की उम्मीद है। जिसमे अभी 1 साल का समय बाकि है। लेकिन पहलवान दीपक पूनिया ने जब कुश्ती स्टार्ट की तो उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था झज्जर गांव का ‘केतली पहलवान’ एक दिन वर्ल्ड मेडलिस्ट बन सकता है क्योंकि उनका लक्ष्य पहलवानी के जरिये सिर्फ नौकरी पाना था जिससे वह अपने परिवार की देखभाल कर सके। ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार ने उन्हें छोटी चीजों को छोड़कर बड़े लक्ष्य पर ध्यान देने का सुझाव दिया और फिर दीपक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

रेसलिंग की शुरुआत
हरियाणा के झज्जर डिस्ट्रिक्ट में दीपक पूनिया का जन्म हुआ था और इस इलाके में रेसलिंग को लेकर एक अलग जूनुन देखने को मिलता है। दीपक के पिता सुभाष पूनिया एक डेयरी किसान हैं जो अपने बेटे को दंगल दिखाने साथ में लेकर जाया करते थे। 5 साल की उम्र में ही दीपक ने अपने गांव में मौजूद आखाडा में प्रैक्टिस करना स्टार्ट किया । सुभाष पूनिया अपने बेटे को रेसलर बनाने में लगातार उसका समर्थन करते रहे और साल 2015 से दीपक के पिता हर दिन 60 किलोमीटर की यात्रा करके अपने बेटे को दूध और फल देने जाने लगे। दीपक एक अनुशासन प्रिय खिलाड़ी थे जो उन्हें उनके पिता ने सिखाया था। पिता ने भी उनकी इस सफलता में लगातार काफी कड़ी मेहनत की है, जिससे दीपक इस मुकाम पर पहुंच सके हैं।

Also Read: नरसिंह यादव जन्मदिन स्पेशल: ‘बैन ख़त्म’ क्या नरसिंह कर पाएंगे 74kg में सक्सेसफुल कमबैक?

सुशील कुमार की सलाह ने बनाया वर्ल्ड मेडलिस्ट
दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सुशील ने दीपक को सलाह दी की वो कुश्ती को अपनी प्राथमिकता बनाएं, नौकरी तुम्हारे पीछे भागेगी। दीपक ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम के अपने सीनियर पहलवान की सलाह मानी और तीन साल के भीतर आयु वर्ग के कई बड़े खिताब हासिल किए। वह 2016 में विश्व कैडेट चैंपियन बने थे और फिर जूनियर विश्व चैम्पियन बने। वह जूनियर चैम्पियन बनने वाले सिर्फ चौथे भारतीय खिलाड़ी है जिन्होंने पिछले 18 साल के ख़िताबी सूखे को खत्म किया था।

अपने आइडल पहलवान से चोट के कारण नहीं लड़ पाए
वर्ल्ड चैंपियनशिप में दीपक को अपने आइडल ईरान के महान पहलवान हजसान याजदानी से भिड़ने का मौका मिला। उन्हें हराकर वह सीनियर स्तर के विश्व चैंपियनशिप का खिताब भी जीत सकते थे। सेमीफाइनल के दौरान लगी टखने की चोट के कारण उन्होंने विश्व चैंपियनशिप के 86 किग्रा वर्ग की ख़िताबी स्पर्धा से हटने का फैसला किया जिससे उन्हें सिल्वर मैडल से संतोष करना पड़ा।

लगन बनी सफलता की वजह
दीपक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस कोच ने कहा, इस खेल में आपको चार चीजें चाहिए होती है जो दिमाग, ताकत, किस्मत और मैट पर शरीर का लचीलापन हैं। दीपक के पास यह सब है। वह काफी अनुशासित पहलवान है जो उसे पिता से विरासत में मिला है। नयी तकनीक को सीखने में एक ही चीज बार-बार करने से खिलाड़ी ऊब जाते है लेकिन दीपक उसे दो, तीन या चार दिनों तक करता रहता है, जब तक पूरी तरह से सीख ना ले।

केतली पहलवान के नाम से हैं फेमस
दीपक को बचपन से ही दूध पीना पसंद है और वह गांव में ‘केतली पहलवान’के नाम से जाने जाते हैं। ‘केतली पहलवान’ के नाम के पीछे भी दिलचस्प कहानी है। गांव के सरपंच ने एक बार केतली में दीपक को दूध पीने के लिए दिया और उन्होंने एक बार में ही उसे खत्म कर दिया। उन्होंने इस तरह एक-एक कर के चार केतली खत्म कर दी जिसके बाद से उनका नाम ‘केतली पहलवान’पड़ गया।

अनुशासित रहते हैं दीपक
दीपक ने कहा कि उनकी सफलता का राज अनुशासित रहना है।उन्होंने कहा, मुझे दोस्तों के साथ घूमना, मॉल जाना और शॉपिंग करना पसंद है। लेकिन हमें प्रशिक्षण केंद्र से बाहर जाने की अनुमति नहीं है। मुझे जूते, शर्ट और जींस खरीदना पसंद है, हालांकि मुझे उन्हें पहनने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि मैं हमेशा एक ट्रैक सूट में रहता हूं। टूर्नामेंट के बाद जब भी मुझे मौका मिलता है मैं बाहर जाकर अपना मनपसंद खाना खाता हूं। लेकिन छुट्टी खत्म होने के बाद उसके बारे में सोचता भी नहीं हूं। उसके बाद कुश्ती और प्रशिक्षण ही मेरी जिंदगी होती है।

Leave a Comment