मिलिए भारत की 3 युवा पहलवानों से जिन्होंने अपने खेल से सबको चौंकाया

By   - 11/07/2020

ओलंपिक एक बार फिर से दस्तक दे रहा है। इस बार पूरी दुनिया के देश जापान के टोक्यो में जुटेंगे लेकिन कोरोना वायरस के चलते अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। कई एथलीट्स क्वॉलिफाई कर चुके हैं और कई रेस में है। पूरी दुनिया की तरह भारत में भी एथलीट्स टोक्यो2020 के लिए जीतोड़ तैयारियाँ कर रही हैं। इन्हीं तैयारियों के बीच हम आपको भारतीय महिला रेसलिंग की युवा पहलवानों से मिलाने जा रहे है जिहोने बहुत काम उम्र ही अपने नाम का ढंका बाजवा दिया है।

दिव्या काकरान
22 साल की दिव्या काकरान भारत में महिला कुश्ती का भविष्य हैं। वह तीन बार की एशियाई चैंपियनशिप पदक विजेता है जिसमे उन्होंने हाल ही में हुई 68 किलोग्राम भर वर्ग में एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल जीता था, साथ ही वो 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक विजेता भी हैं। लेकिन पहलवान का सफर इतना आसान नहीं था। यह कष्ट और संघर्ष से भरा था।

दिव्या एक साधारण परिवार से है दिव्या के पिता दिल्ली, हरियाणा और यूपी के ऐसे इलाकों में जाकर लंगोट बेचते हैं, जहां पहलवान हों। इसके अलावा आसपास के अखाड़ों के बाहर भी लंगोट बेचने के लिए जाते हैं। जबकि दिव्या अपनी पुरस्कार-राशि से परिवार की आय में योगदान देती है , सूरज जो पैसे कमाते है उसने परिवार का खर्चा चलता है ।

लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए और दिव्या का खेल भी अच्छा होता गया, दिव्या ने भारतीय कुश्ती सर्किट में जीत हासिल करना शुरू कर दिया। और यह टाइम दंगल में सीखे दावपेंच को रेसलिंग मैट ले जाने का था। उन्होंने 2013 में अपनी पहली कैडेट एशियाई चैंपियनशिप लड़ी और प्रतियोगिता में रजत पदक विजेता जीता। सीनियर एशियन चैंपियनशिप 2017 में अपनी पहली प्रतियोगिता के प्रदर्शन को दोहराया। दिव्या इस टूर्नामेंट में दूसरे स्थान पर रही।

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उसी साल, उन्होंने कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में एक स्वर्ण पदक और 69 किलोग्राम में एक राष्ट्रीय चैंपियन जीता। उनके प्रदर्शन के कारण, उन्हें उन एथलीटों की सूची में भी शामिल किया गया, जो टोक्यो खेलों में अच्छा कर सकते है। खेल मंत्रालय की लक्ष्य ओलंपिक पोडियम योजना (TOPS) में शामिल किया गया ।

2018 में, एशियाई खेलों और एशियाई चैंपियनशिप 2019 में कांस्य पदक जीता था। 2020 एशियाई चैंपियनशिप के घरेलू मैच में स्वर्ण पदक जीता। दिव्या को टोक्यो खेलों के लिए क्वालीफाई करना बाकी है, लेकिन भरोसा है कि ओलंपिक स्थगित होने के बाद वह ओलंपिक क्वालीफायर में बर्थ बुक करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होंगी।

सोनम मालिक
गांव मदीना, जिला सोनीपत, हरियाणा के किसान परिवार की पहलवान सोनम मालिक एक उभरती हुई प्रतिभाशाली पहलवान है और वो ओलंपिक मेडलिस्ट साक्षी मालिक को एक नहीं दो पर नेशनल ट्रायल्स में मात दे चुकी है अपने खेल से उन्होंने हर बार साक्षी को भौंचक्का किया है। सोनम के फ़ौजी अंकल और उसके पापा के बचपन के दोस्त अजमेर मलिक ने 2011 में अपने खेत में एक अखाड़ा खोलकर कोचिंग देना शुरू किया। राजेंदर ने दोस्त से मिलने के बहाने और सोनम को सुबह घुमाने के बहाने अजमेर मलिक के अखाड़े में आना-जाना शुरू किया।

धीरे-धीरे अजमेर मलिक की कड़ी मेहनत, लगन और ट्रेनिंग स्टाइल ने राजेंदर पहलवान को फिर से कुश्ती के साथ जोड़ा। वो कुश्ती में ही अपनी बेटी का भविष्य देखने के बारे में सोचने लगे। अजमेर मलिक के इस अखाड़े में सिर्फ लड़के ट्रेनिंग करते थे। लिहाज़ा सोनम को शुरू से ही लड़कों के साथ हार्ड ट्रेनिंग करने को मिली। सोनम पिछले पांच साल से लगातार अपने गांव मदीना में कोच अजमेर मलिक के अंडर प्रैक्टिस कर रही हैं। सोनम की उम्र भले कम हो, लेकिन उनकी उपलब्धियाँ शानदार हैं।

साल 2017 के अंत में डॉक्टर्स ने सोनम से साफ कह दिया था कि वह दोबारा मैट पर नहीं लौट पाएंगी। उनके दाहिए कंधे में नर्व से जुड़ी एक गंभीर समस्या आ गई थी। इससे सोनम का दाहिना हाथ काफी प्रभावित हुआ और वह पैरालाइज्ड हो गईं। वर्ल्ड कैडेट रेसलिंग चैंपियनशिप से अपना पहला गोल्ड मेडल जीतकर लौटीं सोनम के लिए यह बड़ा झटका था। भारत के लिए ओलंपिक खेलने का उनका ड्रीम सिर्फ 15 साल की उम्र में खत्म होता दिख रहा था।

लेकिन भगवान की उनपर बड़ी कृपा रही और ठीक होने के बाद सोनम ने 2018 की वर्ल्ड कैडेट रेसलिंग चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज़ और फिर अगले साल गोल्ड मेडल जीता। साक्षी को हराने के बाद सोनम रोम में उतरी। वहां उनकी कुहनी में चोट लगी, जिसके चलते वह पहले ही राउंड में बाहर हो गईं। इसके बाद दिल्ली में एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप हुई। सोनम के लिए यहां भी चीजें बेहतर नहीं रहीं, जबकि साक्षी ने यहां सिल्वर मेडल जीत लिया।

साक्षी के इस प्रदर्शन के बाद दोबारा ट्रायल्स की बात उठी। सबने कहा कि अगर सोनम अच्छा नहीं कर पा रही तो क्यों ना साक्षी को एक मौका और दिया जाए। बात पक्की हुई, ट्रायल्स दोबारा किए गए। इन ट्रायल्स में एक बार फिर से सोनम ने ओलंपिक मेडलिस्ट साक्षी को मात दी।

लेकिन कोरोनावायरस के कारण एक साल आगे बढ़ने से रेसलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया अपने पहलवानों को एक मौका और देना चाहती है। जिसके लिए एक बार फिर ट्रायल्स होंगे, जिस वेट में देश को ओलंपिक कोटा प्राप्त नहीं हुआ है। अगर सोनम यहाँ भी साक्षी मालिक को हरा देगी तो वो जीत की हैट्रिक के साथ ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स खेलने जाएगी।

अंशु मालिक
जींद के गांव निडानी की बेटी अंशु मलिक के खून में ही कुश्ती रमी हुई है। पिता धर्मवीर भी राष्ट्रीय स्तर के पहलवान और किसान हैं। 11 साल की उम्र में अंशु पहली बार कुश्ती मैट पर उतरी थी। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अभी वह 19 साल की हुई है और सीनियर में बड़े पहलवानों को धूल चटाना शुरू कर दिया है।

पहलवान अंशु मलिक ने रोम में हुई विश्व रैंकिंग सीरीज कुश्ती प्रतियोगिता में दो विश्व चैंपियनों को हराकर सनसनी पैदा कर दी। उन्होंने पहले 2018 की चैंपियन मारिया विक्टोरिया को 10-0 से और फिर 2019 की चैंपियन लिंडा मोरिस को 10-4 से पटखनी दी। मलिक ने प्रतियोगिता में रजत पदक जीता। इससे पहले अंशु ने प्रतियोगिता के लिए हुए ट्रायल में कॉमनवेल्थ व विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत चुकी अर्जुन अवार्डी पूजा ढांडा को 3-1 से चित किया था।

उसके बाद एशियाई रेसलिंग चैंपियनशिप में अंशु ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रोंज मैडल अपने नाम किया। इस जीत के साथ ही वो 57 किलो ग्राम वर्ग में ओलंपिक क्वालिफ़ायर्स खेलने के लिए नंबर वन पहलवान है। लेकिन इससे पहले उन्हें एक बार फिर नेशनल ट्रायल्स में वर्ल्ड मेडलिस्ट पूजा ढांडा की चुनौती से पार पाना होगा।

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