इन 10 अखाड़ों ने दिए है भारत को चैंपियन पहलवान

By   - 23/05/2020

कुश्ती दुनिया का सबसे पुराना खेल है और सबसे पुराना ओलंपिक खेल भी है। यह 708 ईसा पूर्व ग्रीस में आयोजित प्राचीन ओलंपिक खेलों का हिस्सा था। साल 1896 में जब ओलंपिक की स्थापना हुई थी, तब कुश्ती को नौ खेलों में शामिल किया गया था। माना जाता है कि कुश्ती की शुरूआत भारत में हुई। पिछले एक दशक में भारतीय पहलवानों ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। और इन पहलवानों को बनाने में देश के कई अखाड़ों का अहम रोल रहा है।

आज हम आपको ऐसे ही देश के नामी टॉप 10 अखाड़ों के बारे में बताएंगे जहा से देश को मिले ओलिंपिक मेडलिस्ट और कई बेहतरीन पहलवान।

गुरु हनुमान अखाड़ा, दिल्ली

अगर इसे अखाड़ों का मंदिर कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह दिल्ली का सबसे पुराना अखाड़ा है। गुरु हनुमान का असली नाम विजय पाल था। वह राजस्थान के झुंझुंनूं जिले के थे। कुश्ती के प्रति लगाव की वजह से उन्होंने 20 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और राजस्थान से दिल्ली आ गए। हनुमान जी से प्रेरित होकर विजय पाल ने अपना नाम बदल कर हनुमान रखा और आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्रण कर लिया। उन्होंने खुद कहा था कि मेरी शादी तो कुश्ती से हो चुकी है। गुरु हनुमान ने ही सबसे पहले सरकार से पहलवानों के लिए नौकरी की मांग की थी, ताकि उन्हें बुढ़ापे में आर्थिक दिक्कत न हो। सरकार ने भी उनकी बात मानी और पहलवानों को सरकारी नौकरी देना शुरू कर दिया।

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कोच: यहां पिछले 32 साल से महासिंह राव ही अकेले और मुख्य कोच हैं। वह वहस्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) की तरफ से यहां नियुक्त किए गए हैं। उन्हें कोचिंग के सबसे बड़े अवॉर्ड द्रोणाचार्य पुरस्कार से साल 2005 में नवाजा जा चुका है। महासिंह राव ने नैशनल लेवल पर खेलने के बाद 1982-83 में एनआईएस, पटियाला से कोचिंग में डिप्लोमा किया था। पिछले 32 साल से वह यहीं सिखा रहे हैं।

अवॉर्ड: अखाड़े ने 16 अर्जुन अवॉर्डी दिए हैं देश को। इनमें राजीव तोमर, वीरेंद्र गूंगा, अनुज चौधरी, सुजीत मान मुख्य हैं। इसके अलावा तीन पदमश्री भी दिए हैं। ये गुरु हनुमान, करतार और महाबली सतपाल (पद्म भूषण भी) हैं। साथ ही महासिंह राव, जगमिंदर सिंह, सतपाल, राज सिंह, सुखचैन को मिलाकर 6 द्रोणाचार्य अवॉर्ड मिले हैं।

छत्रसाल स्टेडियम अखाड़ा, दिल्ली

छत्रसाल अखाड़ा भारत के सबसे प्रमुख कुश्ती शिक्षक, महाबली सतपाल सिंह के लिए प्रसिद्ध है। अपने आचरण में अपेक्षाकृत आधुनिक, यह अखाड़ा खुद को योगेश्वर दत्त और सुशील कुमार जैसे पहलवानों से नवाजता है।

अखाड़े की शुरुआत 1988 में हुई थी। यहां से पांच अर्जुन अवॉर्डी, सुशील कुमार, योगेश्वर, रविंद्र सांगवान, बजरंग पूनिया और अमित दहिया निकले हैं। सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त को पद्मश्री और राजीव गांधी खेल रत्न भी मिल चुका है। इसके अलावा यशवीर सिंह और रामफल मान को द्रोणाचार्य अवॉर्ड से नवाजा जा चुका है। अगर इस अखाड़े को कुश्ती का मक्का बोलते तो गलत नहीं होगा। हाल ही में इस अखाड़े के युवा पहलवान दीपक पुनिया ने 86 किलो ग्राम और रवि दहिया ने 57 किलो में भारत को टोकियो के लिए ओलिंपिक कोटा दिलाया है

कैप्टन चांदरूप अखाड़ा, दिल्ली

मूल रूप से रोहतक के सुंडाणा गांव के निवासी कैप्टन चांदरूप 37 साल से दिल्ली की आजादपुर मंडी में कुश्ती अखाड़ा चला रहे थे। कैप्टन चांदरूप ने देश को कई ओलिंपिक पहलवान तैयार करके दिए। उनके अखाड़े में अव्वल पहलवानों ने ट्रेनिंग ली। ऐसा शायद ही कोई समय रहा होगा, जब उनके अखाड़े का पहलवान देश के टॉप पहलवानों में नहीं रहा हो। उनके शिष्यों में 5 अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। कई भारत केसरी और राष्ट्रीय चौंपियन बन चुके हैं। कैप्टन चांदरूप को साल 2010 में द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

कैप्टन चांद रूप के पोते एवं आजादपुर सब्जी मंडी दिल्ली स्थित अखाड़े के संचालक अमित ढाका ने बताया कि उनके दादा ने जीवन की आखिरी सांस तक कुश्ती को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने बताया कि उनके दादा के शिष्यों ओमबीर सिंह, रोहतास दहिया, अशोक कुमार, रमेश कुमार, धर्मेंद्र दलाल आदि को कुश्ती में अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

अमित ढाका ने बताया कि उनके दादा ने अपने सेना के सेवाकाल के दौरान भारत-चीन युद्ध 1962 तथा वर्ष 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में भी अपनी बहादुरी दिखाई ।

गुरु प्रेमनाथ अखाड़ा, दिल्ली

विक्रम कुमार सोनकर गुरु प्रमनाथ अखाड़ा के निदेशक और एक शानदार कोच हैं। वह भारत के प्रमुख पहलवान श्री प्रेमनाथ (अर्जुन अवार्डी, ओलंपियन) के पुत्र हैं। विक्रम पिता के जाने के बाद अखाड़े को सुचारु रूप से चलाने के लिए अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी।वो साई में एक रेसलिंग कोच के तौर पर काम कर रहे थे क्योंकि विक्रम कुमार के पिता प्रेमनाथ की सपना था कि उनके अखाड़े से कोई खिलाड़ी निकले जो ओलिंपिक में मैडल जीत कर लाए। अपने पिताजी के सपने को पूरा करने के लिए, विक्रम कुमार ने अपनी नौकरी छोड़ दी और फिर देश के लिए ओलिंपिक मेडलिस्ट तैयार करने का रास्ता चुना ।

उनकी कड़ी मेहनत का नतीजा है कि इस अखाड़े के बच्चे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत रहे हैं। इस अखाड़े की दिव्या काकरान ने खुद को कई बार साबित किया है। हाल ही में हुई एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर रेसलर दिव्या ने अपने परिवार का सपना साकार किया है। दिव्या को यहां तक पहुंचाने में उनकी मेहनत के अलावा पिता सूरज पहलवान की कोशिशें कोच विक्रम की मेहनत और बड़े भाई देव की कुर्बानी भी अहम रही हैं। दिव्या के अलावा इंदु चौधरी, सिमरन, ओर उन्नति राठौर ने अन्तराष्ट्रीय कुश्ती में कई पुरस्कार और पदक जीतकर, अखाडा का नाम रोशन किया है। इस अखाड़े से जुड़े कई ओर खिलाड़ी भी बड़ी सफलता की ओर जा रहे हैं। इस सब के पीछे कोच विक्रम कुमार की मेहनत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

“मैं 9 साल से अखाड़े में प्रैक्टिस कर रही हूँ। विक्रम सर ने हमेशा मेरा साथ दिया है उन्होंने मेरे साथ बहुत मेहनत की है जो में आज इस मुकाम पर पहुंच पाए, उनका योगदान इसमें सदा रहेगा” दिव्या ने रेसलिंगटीवी को बताया ।

गुरु प्रेमनाथ अखाड़े में 150 बच्चें प्रैक्टिस करते है जिसमे 80 लड़कियाँ और 70 लड़के है । विक्रम बच्चों से कोई फीस नहीं लेते सभी पहलवान बस अपने खाने पीने का खर्च खुद उठाते है । जिसमे कुछ पहलवान अखाड़े में ही रहते है।

श्री लक्ष्मीनारायण व्यासशाला, आर्थर रोड, मुंबई

1930 के दशक में भारतीय युवाओं को जुटाने और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए स्थापित यह अखाड़ा अब 500 से अधिक पुरुषों का घर है, जो यहां कुशती के शिल्प को सीखते हैं।

देवलाची तालीम, महात्मा फुले पेठ, पुणे

शहर के सबसे पुराने तालीम (अखाड़ा) में से एक, देवलाची तालीम को रामदास स्वामी द्वारा शुरू किया गया था, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रभाव में से एक था। यह अखाड़ा प्रसिद्ध पहलवान हीरामन बंकर का घर रहा है और सही मायनों में भारत का सांस्कृतिक गौरव माना जाता है

चिंची तालीम, शुकरवार पेठ, पुणे

यह अखाड़ा पुणे में पेशवा के शासन के दौरान 1773 में म्हासकाजी दामोदर पंडित द्वारा बनाया गया था। बुवासाहेब ग़ुम ने अपने कौशल के साथ कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसाएँ जीतने के बाद इस अखाड़े को मान्यता और गौरव दिलाया।

गुरु श्याम लाल अखाड़ा, अर्जुनगढ़, हरियाणा

हरियाणा ने भारत को खेल के इतिहास के कुछ सबसे प्रमुख पहलवान दिए हैं। योगेश्वर दत्त से लेकर गीता फोगट तक, हरियाणा ने अखाड़ा संस्कृति को जीवित रखने में बहुत ही मार्मिक भूमिका निभाई है। अर्जुनगढ़ मेट्रो स्टेशन के आसपास के क्षेत्र में स्थित गुरु श्याम लाल अखाड़ा एनसीआर क्षेत्र में अधिक सुलभ अखाड़ों में से एक है।

गुरु लीला अखाड़ा, लाडपुर, हरियाणा

लाडपुर के बहादुर लीलु पहलवान द्वारा निर्देशित, यह अखाड़ा शहर के जीवन की हलचल से बहुत दूर है। अखाड़े में मिट्टी की रिंग भगवान हनुमान के मंदिर से अच्छी तरह से पूरक है। अखाड़ा पहलवानों की दैनिक आहार संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रसोई की सुविधाओं से भी लैस है।

शिवालय पहलवान जी का अखाड़ा, मथुरा, उत्तर प्रदेश

दुनिया में वैश्वीकरण की लहर से प्राचीन शहर मथुरा का जीवन अस्त-व्यस्त है। हालांकि, शहर की विरासत में अखाड़े एक मजबूत आधार बनाते हैं। शिवाजी पहलवानजी का अखाड़ा शहर के सबसे प्रतिष्ठित अखाड़ों में से एक है जो देश भर के युवा सपने देखने वालों को आकर्षित करता है।

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