बेटे जगदीश और ओम कालीरमन ने पिता ‘मास्टर चंदगीराम’ की 10वी पुण्यतिथि मनाई: देखें वीडियो

By   - 30/06/2020

दिग्गज पहलवान मास्टर चंदगीराम की 10वी पुण्यतिथि को सिविल लाइन, चन्दगी राम अखाड़े में हवन करके मनाया गया। जिसमे उनके परिवार के लोग बेटे जगदीश कालीरमन , ओम कालीरमन, रेसलिंग कोच और गांव के लोग शामिल हुए।

बेटे ओम कलीराम ने पिता चंदगीराम की 10वी पुण्यतिथि पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कुछ फोटो और वीडियो शेयर किये और एक भावुक पोस्ट लिखा “यह मेरे लिए एक कठिन दिन है, जैसा कि यह मेरे पिता की पुण्यतिथि है, उन्होंने मुझे तब छोड़ा था जब मैं पंद्रह वर्ष के आसपास था और मैं बहुत यंग था और मुझे दुनिया के बारे में नहीं पता था। 10 साल हो गए है और उनकी आत्मा हमेशा मेरे साथ रही है मुझे पता है कि उन्होंने मुझे अपने पैरों पर छोड़ने के बाद भी कठिन समय से गुजरने में मदद की है। मेरे पिता स्वर्गीय चंदगीराम बनना बहुत कठिन है, उन्होंने अर्जुन पुरस्कार, पदम श्री और कई अन्य महान प्रतिमाओं को हासिल किया था, लेकिन हर रोज मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि मैं उन्हें गौरवान्वित करूंगा”।

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मास्टर चंदगीराम का सफर
हरियाणा के हिसार में 1937 में जन्मे चंदगीराम ने 21 साल की उम्र में कुश्ती लड़नी शुरू की थी. दसवीं पास करने और कला और शिल्प में डिप्लोमा प्राप्त करने वाले चंदगी राम ने भारतीय सेना के जाट रेजिमेंट में भी कुछ दिन काम किया. इसके बाद वह एक स्कूल में अध्यापक के तौर पर रहे और तभी से उन्हें मास्टर का नाम मिला और वह मास्टर चंदगीराम के तौर पर जाने गए. मास्टर चंदगी राम के समय में भारत में कुश्ती पारंपरिक रूप से खेली जाती थी, जहाँ पहलवान एक दूसरे की जांघिया पकड़कर और मिट्टी के अखाड़ों में खेलते थे. हिंद केसरी, भारत केसरी, भारत भीम और रूस्तमे हिंद जैसे ख़िताबों के बाद उन्हें 1969 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया.

पहले हिन्दू भारत केसरी बने
जब साल 1968 में पहली बार भारत केसरी कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन हुआ तो फाइनल मुक़ाबले में मास्टर चन्दगीराम और मेहरदीन आमने सामने थे फिर वो हुआ जो किसी ने कभी सोचा नहीं था मास्टर चन्दगीराम ने अपने चिरप्रतिद्वंदी मेहरदीन को मात्र 38 मिनट में पराजित किया। और इस जीत के साथ ही मास्टर चंदगी राम पहले ऐसे हिन्दू भारतीय बने जिन्होंने पहले भारत केसरी का टाइटल अपने नाम किया था। और जब दूसरी बार भारत केसरी के दंगल के फाइनल में मेहरदीन सामने आया तो महज आठ मिनट में ही अखाड़ा छोड़ दिया था और बिना लड़े ही हार मान ली थी |

पहले हिन्दू भारत केसरी बनने के बाद यह जीत किसी को रास नहीं आई और इंदौर के बॉम्बे बाजार में मास्टर चन्दगीराम के जीत के जलूस में काफी दगे हुए । अर्जुना अवार्डी कोच किरपा शंकर ने इस पुरे वाक़या को हमारे साथ शेयर करते हुए बताया ” उस समय जब मास्टर जी ने महेरदीन को हराया और वो पहले हिन्दू भारत केसरी बने थे तो जीत के बाद जब उनका जलूस निकल गया तो बॉम्बे बाजार में इसको लेकर बड़ा विरोध हुआ और दंगे हुए। जब से यहाँ की सरकार ने कानून बनाया के कोई भी दंगल हिंन्दू और मुस्लिम के बीच नहीं होगा जो कानून आज तक लागू है”।

मास्टर चंदगीराम की मोटी कलाई
मास्टर चंदगीराम कि कलाई इतनी मोटी थी कि उसमे घड़ी नहीं आते थी इसके लिए बीच में उहने कलावा डालना पड़ता था जब जाकर वो अपने कलाई में घड़ी पहन पाते थे “उनके हाथ में जो घड़ी बंधी थी , उसका पट्टा उनकी कलाई में नहीं आ रहा था, इसलिए उसके बीच में कलावा बंधा हुआ था। पूछने पर मास्टर जी ने बताया कि घड़ी का कोई भी पट्टा उनकी कलाई में नहीं आता है। इसलिए बीच में कलावा बांधना ही पड़ता है” नवभारत टाइम रिपोर्ट।

खेल की परंपरा बदली
चंदगीराम को पता था कि हर जगह गद्दों की तो व्यवस्था नहीं हो सकती मगर ओलंपिक में कुश्ती में हिस्सा लेने के लिए ज़रूरी है कि पहलवान अपने प्रतिद्वन्द्वी का जांघिया न पकड़ें और उन्होंने इस पर ज़ोर दिया. हालाँकि इसका विरोध भी हुआ पर आख़िरकार उनकी बात मानी गई.

गुरु हनुमान अखाड़े के कोच और गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित पहलवान महासिंह राव कहते हैं, “उन्होंने सबसे पहले ये कहा कि जांघिया पकड़ना बंद करो. हमने और कुछ और लोगों ने भी इसका विरोध किया मगर उनका कहना था कि जब ओलंपिक में जांघिया पकड़कर कुश्ती नहीं होती है तो हमारे बच्चे भी ये करना बंद करें.”

महा सिंह मानते हैं कि इसका फ़ैसला भी अच्छा आया जबकि सुशील कुमार जैसे पहलवान ने बीजिंग ओलंपिक में काँस्य पदक जीता. उनके अनुसार मास्टर चंदगीराम की सोच कुश्ती के प्रति दूरगामी थी.

मास्टर चंदगीराम के अंतरराष्ट्रीय जीवन का सबसे अहम पड़ाव 1970 में आया जबकि उन्होंने बैंकॉक में विश्व चैंपियन ईरान के अमवानी अबुफ़ाज़ी को हराकर एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता.

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