कहानी ऐसे पहलवान की जिसने 12 साल की उम्र में जीता इंटरनेशनल गोल्ड मैडल और फिर रचा इतिहास

By   - 10/07/2020

रेसलर योगेश्वर दत्त भारत के तीसरे ऐसे पहलवान हैं जिन्होंने ओलंपिक में देश का नाम गौरांवित किया है। दत्त हरियाणा के सोनीपत ज़िले के एक छोटे से गांव बैंसवाल कलां से ताल्लुक़ रखते है। लोग ओलिंपिक मेडलिस्ट को प्यार से ‘योगी’ या फिर ‘पहलवान जी’ के नाम से बुलाते है। योगेश्वर दत्त के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही लंदन 2012 ओलंपिक में देश के लिए ब्रॉन्ज़ मेडल जीतना। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उनकी काफी मेहनत छुपी हुई है।

रेसलिंग की शुरुआत


योगेश्वर दत्त का रेसलिंग से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। उनके माता-पिता पेशे से स्कूल टीचर थे और वह चाहते थे कि उन्हीं की तरह उनका बेटा भी एक टीचर बने। लेकिन उस समय उनके गांव के एक मशहूर पहलवान बलराज के कारनामों ने उन्हें रेसलिंग की ओर आकर्षित किया। शुरुआत में उनके माता-पिता रेसलिंग के खिलाफ थे लेकिन जब उनके बेटे ने स्कूल और गांव में कुश्ती प्रतियोगिताओं के ज़रिए नाम कमाना शुरू किया तो उनका नज़रिया भी बदलने लगा।

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12 साल की उम्र में जीता इंटरनेशनल गोल्ड मैडल
पहलवान दत्त जब 12 बरस के थे तब पोलैंड में होने वाले इंटरनेशनल कैडेट गेम्स में खेलने के लिए उनको चुना गया। इस इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपने आत्मविश्वास और उम्मीदों को एक नई दिशा दी। दो साल के बाद रेसलिंग की बेहतर ट्रेनिंग लेने के लिए वह अपने परिवार को छोड़कर नई दिल्ली चले गए। जहां छत्रसाल स्टेडियम में उन्होंने कुश्ती के गुर, गुरु सतपाल सिखने स्टार्ट किए।

करियर का अहम मोड़

योगेश्वर के रेसलिंग करियर में एक अहम मोड़ तब आया जब उन्होंने साल 2003 में लंदन में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। फिर साल 2006 में उन्होंने दोहा में हुए एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। इसके बाद योगेश्वर ने अगले साल ही कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप और साल 2008 में एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल हासिल करके रेसलिंग की दुनिया में अपना दम दिखाते हुए 2008 में होने वाले बीजिंग ओलंपिक में 60 किलोग्राम भारवर्ग कुश्ती के लिए क्वालिफाई किया। हालांकि बीजिंग ओलंपिक में उनका सफर कुछ ख़ास नहीं रहा लेकिन अपनी असफलताओं से सीख लेते हुए वह आगे बढ़े और मेडल जीतने की अपनी भूख को उन्होंने बरक़रार रखा।

देश को थी ओलंपिक मैडल की उम्मीद

साल 2010 में जब भारत में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन किया गया तो पूरे भारतवासियों को योगेश्वर से काफी उम्मीदें थीं। इस दबाव के बावजूद यह पहलवान देशवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरा और 60 किलोग्राम भारवर्ग में सोने का तमगा अपने नाम किया। इसके बाद उनसे उम्मीदें और बढ़ गईं। बढ़ी उम्मीदों के बोझ के साथ अब उनका अगला लक्ष्य था साल 2012 में होने वाला लंदन ओलंपिक।

ओलंपिक में मैडल जीतने वाले तीसरे भारतीय रेसलर


लंदन ओलंपिक में मेडल जीतना उनके कुश्ती करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। 12 अगस्त 2012 को उन्होंने मेन्स फ्रीस्टाइल 60 किलोग्राम भारवर्ग में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता। उस समय ओलंपिक में भारत की तरफ से मेडल जीतने वाले वह तीसरे रेसलर बने। उनसे पहले यह कारनामा सिर्फ केडी जाधव (1952) और सुशील कुमार (2008, 2012) ने किया था।

2016 ओलिंपिक के बाद लिया संन्यास
साल 2016 में हुए रियो ओलंपिक में योगेश्वर का सफर भुलाने वाला रहा। ओलंपिक में उनके एक और मेडल जीतने की उम्मीदें उस समय टूट गई जब वह पहले राउंड में ही हार कर बाहर हो गए। इसके बाद उन्होंने कुश्ती से संन्यास ले लिया और कोचिंग देना स्टार्ट किया। योगेश्वर हरियाणा के सोनीपत में अपनी रेसलिंग अकादमी भी चला रहे हैं जहां वह युवा पीढ़ी के हीरो को तराशने का काम रहे हैं।

योगेश्वर दत्त जैसे दिग्गज रेसलर ने खेल की दुनिया में हमारे देश का नाम रोशन तो किया ही है इसके साथ ही साथ वह युवा पीढ़ी को कुश्ती में अपना करियर बनाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।

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