भारतीय रेसलिंग के ‘जय-वीरू’, जानिए कैसे शुरू हुई दोनों पहलवानों की दोस्ती

By   - 12/10/2020

जितेंद्र कुमार या जीतू, जिस नाम से आप उन्हें जानते हों, वो अब एक होनहार रेसलर बन चूका है। जितेंदर सफलता की सीढ़ियां बहुत ही तेजी से चढ़ रहा है। उन्होंने अब तक काफी लंबा रास्ता तय किया है।जिसमे कई बार उनको उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। जितेंद्र ने फ़रवरी में हुई एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर चयनकर्ताओं के भरोसे को सही साबित किया। जितेंदर इस समय भारत के लिए 74 किलो ग्राम वर्ग के प्रबल दावेदार है और उनके प्रदर्शन ने यह साबित किया है। आज हम आपको जितेंदर की कहानी उनकी ही जुबानी सुनाने जा रहे है। कैसे उन्होंने रेसलिंग की शुरुआत की और यहाँ तक पहुंचने के लिए उन्होंने कितनी कठिनाइयों का सामना किया।

मेरा जन्म तिरप्री गाँव, गुड़गांव, हरियाणा में हुआ था और मेरे पिता भारतीय सेना में थे और उनके लिए खेलते थे कुश्ती के प्रति पिताजी काफी उत्साही हैं, वही मेरे रेसलर बनने की कहानी की शुरुआत हुई और कुश्ती खेलना शुरू कर दिया है। अब बस उनके नक्शेकदम पर चल रहे हैं मेने 15 साल की उम्र में जय वीर अखाडा, भूपनिया गाँव, झज्जर, हरियाणा में कुश्ती का अभ्यास शुरू किया था।

 

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#Dosti 🤝 😍 @jitender74kg

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रेसलिंग करते करते इंटरस्ट पैदा होता गया जब छोटे थे तो ज्यादा ध्यान सिखने पर होता था फिर जूनियर लेवल पर आये तो हार्डवर्क पर ध्यान देना पड़ा अब जब सीनियर लेवल पर खेल रहे है तो सारी चीजे करता हूँ सीखते भी हूँ और मेहनत भी करता हूँ।

एक समय ऐसा भी आया था जब मेने एक गलत एनर्जी ड्रिंक ले लिया था मुझे नहीं पता था उसमे ऐसा कुछ है के मुझे इसके कारण रेसलिंग से दूर हों पड़ेगा। वो समय मेरे लिए बहुत मुश्किल था है किसी से बात करने का मन नहीं करता था अपने कमरे से बहार नहीं निकलता था। रेसलिंग करने मैट या अखाड़े में जाता था बिलकुल मन नहीं लगता था आखो में आंसू आ जाते थे बस अपने ऊपर लगे बन के बारे में ही सोचता रहता था लेकिन मेरे कोच और भाई ने इस से निकलने में मेरी काफी मदद की उन्होंने बोला तु मिटटी के दंगल लड़, 2 साल कब निकल गए पता भी नहीं चलेगा कब तेरे ऊपर लगा बन हट जायेगा। वही हुआ फिर 2 साल कब निकल गए पता ही नहीं चला।

फिर 2016 में मेरा पहला कमबैक टूर्नामेंट था एशियाई चैंपियनशिप जो सिंगापोर में था उसमे मेरा प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था में सेमीफइनल तक खेला फिर हर गया था लेकिन उसके बात सभी ने मेरा काफी हौसला बढ़ाया कहा कोई बात नहीं तु काफी अच्छा खेला है लेकिन फिर मुझे इंजरी हो गए फिर मुझे सर्जरी करनी पड़ी तो काफी उत्तर चढ़ाव के बाद में यहाँ तक आया हूँ।

मैं और बजरंग शुरू से ही दोस्त है जूनियर स्तर से ही, जब हम अपने पहले शिविर में शामिल हुए थे तब से हम दोस्त रहे हैं। जब मुझ पर प्रतिबंध लगा था, तब भी उन्होंने मेरा बहुत समर्थन किया और हम लगातार संपर्क में रहे। बजरंग भी दंगल लगता था और मैं भी तो वहाँ भी हम मिलते और बात करते थे वही से दोस्ती भी स्टार्ट हुई हमारी काफी पुरानी दोस्ती है। और अब हम सीनियर लेवल पर भी एक साथ ही खेल रहे है तो काफी अच्छा लगता है एक दूसरे की कामियाबी देख कर। अभी बस में ओलिंपिक के लिए मेहनत कर रहा हूँ बजरंग भाई के साथ ही रहता हूँ ट्रेनिंग करता हूँ।

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