मिलिए भारतीय कुश्ती की ‘लेडी सिंगम’ पहलवानों से, निभा रही है सारे फ़र्ज़

By   - 30/07/2020

आज हम आपको भारतीय रेसलिंग की तीन ऐसी महिला पहलवानों से मिलाने जा रहे है जिनको अपनी लाइफ में कई मौको पर परीक्षा से गुजरना पड़ा और वो हर परीक्षा में सफलता की सीडी चढ़ती चली गई । उन्होंने अपनी लाइफ में हर मोड पर अलग-अलग रोल अदा किए है। देश के लिए मैडल जीता, पुलिस में देश की सेवा कर रही है और अपने घर पर एक माँ का फ़र्ज़ भी निभा रही है। आइए आपको मिलवाते है भारतीय कुश्ती की लेडी सिंगम पहलवानों से..

गीतिका जाखड़
गीतिका जाखड़ का जन्म हरियाणा के गांव अग्रोहा में हुआ। गीतिका एक स्पोर्ट्स पर्सन परिवार से आती हैं। उन्हें साल 2006 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया। जाखड़ अर्जुन अवार्ड पाने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान हैं। वह भारतीय खेलों के इतिहास में एकमात्र महिला पहलवान हैं, जिन्हें 2005 की कामनवेल्थ चैंपियनशिप के सर्वश्रेष्ठ पहलवान के रूप में उन्हें चुना गया। उन्होंने साल 2006 और 2014 के एशियाई गेम्स में सिल्वर और ब्रोंज जीता।

रेसलिंग की शुरुआत
गीतिका के पिता सत्यवीर सिंह जाखड़ हरियाणा के हिसार में एक खेल अधिकारी हैं। गीतिका के दादा जी अमर चंद जाखड़ भी एक पहलवान थे और उनसे ही प्रेरणा लेकर उन्होंने रेसलिंग को चुना। 13 साल की उम्र में उन्होंने रेसलिंग की शुरुआत की, 2 साल बाद ही उन्होंने सोनिका कालीरमण (प्रसिद्ध पहलवान चंदगी राम की बेटी) को 2000 में नई दिल्ली में आयोजित भारत केसरी दगल में हराकर, 15 साल की उम्र में भारत केसरी का टाइटल अपने नाम किया। तब से लगातार 9 साल तक उन्होंने भारत केसरी का खिताब पर कब्ज़ा रखा।

गेम्स में बनाया रिकॉर्ड
गीतिका ने फिर इसके बाद कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और नेशनल गेम्स में एक नया रिकॉर्ड बनाया। साल 2001 की नेशनल चैंपियनशिप के सभी संस्करणों – सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर में गोल्ड मैडल जीतने वाले सबसे कम उम्र के पहलवान बन गए। यह एक सराहनीय रिकॉर्ड है जो अभी तक टूटा नहीं है। अगले ही साल उनके अंतर्राष्ट्रीय कैरियर की शुरुआत 2002 में न्यूयॉर्क, यूएसए में वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में हुई। जिसमे वो क्वार्टर -फाइनल तक पहुंची थी। साल 2006 और 2014 में उन्होंने देश को एशियाई गेम्स और कामनवेल्थ गेम्स में मैडल दिलाये। 2006 में वो एशियाई गेम्स में सिल्वर मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बानी।

अवार्ड्स
भीम अवार्ड, 2003 – भारत के हरियाणा राज्य के आउटस्टैंडिंग एथलीटों को दिया गया
अर्जुन अवार्ड – 2006
कल्पना चावला एक्सीलेंस अवार्ड फॉर आउटस्टैंडिंग वीमेन -2009
फेस ऑफ़ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ इन हरियाणा
ब्रांड एम्बेसडर ऑफ़ डिजिटल कैशलेस वीक (20-27 फेब 2017 ) इन हिसार ,हरियाणा

हरियाणा पुलिस की पहली भारतीय महिला पहलवान डीएसपी
हरियाणा के हिसार की रहने वाली महिला पहलवान गीतिका जाखड़ इस वक्त हरियाणा पुलिस में डीएसपी की पोस्ट पर तैनात है। वे हरियाणा की पहली महिला पहलवान हैं जिन्हें हिसार के महिला थाने में महिला थाने में सीधे डीएसपी लगाया गया। आजइ गीता देश के लिए हरियाणा पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे है।

गीतिका का लाइफ पार्टनर
साल 2016 में गीतिका की शादी हरियाणा के महेंद्रगढ़ के रहने कमल से हुए। पति कमल इंजीनियर हैं । वे इस वक्त PWD में एसडीओ की पोस्ट पर तैनात हैं। इसी साल उन्होंने बेटी को जन्म भी दिया और अब वो अपने सरे फ़र्ज़ अदा कर रही है।

गीता फोगाट
कुश्ती के क्षेत्र में गीता फोगाट एक ऐसा नाम है जिसे हर कोई जानता है। गीता फोगाट का जन्म 15 दिसम्बर 1988 को भारत के हरियाणा के छोटे से गावं बलाली के भिवानी जिला में हुआ था। गीता के पिता महावीर सिंह फोगाट ही उनके कुश्ती के कोच थे व खुद भी एक पहलवान थे। 2010 में दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों में फ्री स्टाइल महिला कुश्ती के 55 Kg कैटेगरी में गीता फोगाट ने गोल्ड मेडल अपने नाम करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। गीता फोगाट एक उदाहरण व प्रेरणास्त्रोत हैं सभी युवा लड़कियों के लिए कि आप अगर ठान लो तो जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते है।

ऐसे ही गीता और उसके पिता को भी कोई नहीं रोक पाया और आगे चल कर गीता ने कुश्ती में वो कीर्तिमान स्थापित किये। साल 2000 के सिडनी ओलंपिक में जब कर्णम मल्लेश्वरी ने वेट लिफ्टिंग में कांस्य पदक जीता तो वह ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गयीं। दोहा में आयोजित वर्ष 2015 के एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने तीसरा स्थान प्राप्त किया और कांस्य पदक जीता था।
इस जीत का गीता के पिता महावीर सिंह फोगाट पर गहरा असर हुआ उन्हें लगा जब कर्णम मल्लेश्वरी मैडल जीत सकती है तो मेरी बेटियां भी मैडल जीत सकती हैं। और यहीं से उन्हें अपने बेटियों को चैंपियन बनाने की प्रेरणा मिली।

इसके बाद ही उन्होंने गीता-बबीता को पदक जीतने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। महावीर जी ने कसरत से लेकर खाने-पीने हर चीज के नियम बना दिए और गीता-बबीता को पहलवानी के गुर सिखाने लगे। गीता के पिता 80 के दशक के एक बेहतरीन पहलवान थे और अब वह गीता के लिए एक सख्त कोच भी थे। गीता ने कहा था, “पापा मुझसे अक्सर कहते थे कि तुम जब लड़कों की तरह खाती-पीती हो, तो फिर लड़कों की तरह कुश्ती क्यों नहीं लड़ सकती? इसलिए मुझे कभी नहीं लगा कि मैं पहलवानी नहीं कर सकती।”

गांव के दंगल से आगे बढ़ते हुए गीता फोगाट ने जिला और राज्य स्तर तक कुश्ती में सभी को पछाड़ा और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खुद को तैयार करने लगीं। गीता कहती है कि पिता ने हमेशा मुझे इस बात का एहसास कराया कि मैं लड़कों से कम नहीं हूं। गांव वालों को बेटियों का पहलवानी करना कत्तई पसंद नहीं था। लेकिन पापा ने कभी उनकी परवाह नहीं की।”

2009 में राष्ट्रमंडल कुश्ती चैपियनशिप में गीता ने स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद गीता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2010 में दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों में फ्री स्टाइल महिला कुश्ती के 55 किग्रा भार वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया। और ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय महिला बन गयीं। इसके अलावा साल 2012 में इन्होंने एशियन ओलंपिक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया था।

2012 में गीता ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के 55 किलो ग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीता था। और ऐसे करने वाली वो दूसरी महिला पहलवान बनी। और इसी साल गीता ने FILA (फिला एशियन ओलम्पिक क्वालिफिकेसन टूर्नामेंट) में 55 किलो भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता. 2012 में ही गुमी में एशियन चैंपियनशिप प्रतियोगिता जोकि 55 किलो ग्राम के भार वर्ग की थी में कांस्य पदक जीता था.

गीता को हरियाणा पुलिस में उप अधीक्षक (डीएसपी) के रूप में गीता की नियुक्ति हुई थी। साल 2016 में गीता ने रेसलर पवन कुमार सरोहा से शादी की और अब अब गीता माँ बन चुकी है उनके बेटे का नाम अर्जुन है।

गुरशरण प्रीत कौर
गुरशरण के पिता जल्दी हे गुजर गए थे जब वो बहुत छोटी थे। उनकी पास घर को चलने की जिम्मेदारी थी और उन्होंने जॉब के लिए रेसलिंग को चुना। मोहनपुरा बिलिंग गांव की गुरशरण पंजाब पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं और गुरशरण प्रीत कौर ने 37 साल की उम्र में कुश्ती में आठ साल के बाद वापसी की और एशियन कुश्ती चैंपियनशिप 2020 में 72 किलोग्राम भार वर्ग में गुरशरण प्रीत कौर ने कांस्य पदक जीतकर एक नया इतिहास लिखा।

पंजाब के तरनतारन की रहने वालीं गुरशरण ने दैनिक जागरण से खास बातचीत में कहा, ‘2013 में मेरी शादी हो गई थी। मेरे पति मुझे खेलने नहीं देते और लड़कों के साथ कुश्ती नहीं करने देते थे। जब मैं लड़कों के साथ अभ्यास करती थी तो वह मुझे बहुत मारते थे। मुझे अपने पति से अलग होना पड़ा। मैं एक लड़की की मां बनी लेकिन मेरे पति लड़की नहीं चाहते थे। मैं मां थी और मैं उसे मरने नहीं दे सकती थी।

मेरे पति ने कहा कि तुम्हें मेरे और बेटी में से किसी एक को चुनना होगा तो मैंने उसी वक्त अपनी बेटी को चुन लिया। मेरी बेटी तीन साल की है। उन्होंने मेरी कुश्ती छोड़ने के लिए मजबूर किया। अगर मैं 2013 से कुश्ती करती रहती तो मेरे पास और पदक होते। जब आप मन से हार मान लोगे तो हार जाओगे लेकिन मैंने अभी हार नहीं मानी है।

2018 से मैंने फिर से अभ्यास करना शुरू किया। जब मैं बहुत छोटी थी तो मेरी पिता जी की मृत्यु हो गई थी। संघर्ष तो जिंदगी का एक हिस्सा है और संघर्ष के बिना हम कोई भी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते। संघर्ष करेंगे तो आगे बढ़ेंगे। मैंने जो पदक जीता है वो अपनी मां की मदद से जीता है। उन्होंने मेरा हमेशा से साथ दिया है। मुझे किसी भी चीज की जरूरत होती है तो वो मेरी मम्मी ही पूरा करती हैं। जब तक मेरे अंदर दम है तो मैं कुश्ती करूंगी।

उन्होंने कहा, ‘मैं उम्र को नहीं मानती। उम्र सिर्फ एक नंबर है। जब तक हमारे अंदर हिम्मत है, हम कुश्ती करेंगे। जब तक हम जीत रहे हैं तो हम खेल रहे हैं चाहे हम 50 साल के भी क्यों ना हो। एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में मेरा यह पहला पदक है। 2012 में जब मैंने कुश्ती छोड़ी थी तो उसके आठ साल के बाद कुश्ती में वापसी के बाद भी मेरा पहल पदक था। दक्षिण एशियाई खेलों में मैंने स्वर्ण जीता था। अब मेरा लक्ष्य ओलंपिक के लिए आगामी ट्रायल को जीतना है।

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