आज ही के दिन 2012 लंदन ओलंपिक में सुशील कुमार बने थे डबल ओलंपिक मेडलिस्ट, कहां ‘मेरे जीवन के सबसे महान क्षणों में से एक’

By   - 12/08/2020

ओलंपिक इतिहास में भारत के लिए 2012 ओलंपिक सबसे शानदार और सफल रहा है। लंदन 2012 में भारत की ओर से कुल 83 प्रतिभागियों ने शिरकत की थी, जिनमें 60 पुरुष और 23 महिलाएं शामिल हैं। जिन्होंने भारत की झोली में कुल 6 पदक डाले थे, इनमें दो रजत पदक और चार कांस्य पदक शामिल थे। भारत के इस प्रदर्शन ने उनके पिछले सर्वश्रेष्ठ को भी पीछे छोड़ दिया था जो बीजिंग 2008 में देखने को मिला था।

आज ही के दिन भारत की ओर से सुशील कुमार ने 2012 लंदन ओलंपिक में अपना दूसरा ओलंपिक मैडल जीत कर इतिहास रचा और ऐसा करने वाले वो पहले भारतीय बने। जिसको उन्होंने याद करते हुए अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया ओर लिखा “मेरे जीवन के सबसे महान क्षणों में से एक। इस दिन 2012 में लंदन में 12 अगस्त को इतिहास रचा गया। मैंने अपना दूसरा ओलंपिक पदक जीता। यह निश्चित रूप से मेरे करियर का सबसे बड़ा ऊँचा स्थान है और मैं धन्य महसूस करता हूँ कि मैं ऐसा करने में सक्षम था। मैं अपने गुरूजी को अपने परिवार, सभी कोचों और सहयोगी स्टाफ को धन्यवाद देना चाहता हूँ और विशेष रूप से आप सभी का जिन्होंने हमेशा मेरा समर्थन किया और मेरे लिए प्रार्थना की”।

2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद, भारतीय पहलवान सुशील कुमार ने ऊंचाई पर पहुँचकर संन्यास लेने की बात कही थी। लेकिन सुशील कुमार का ओलंपिक का सपना अभी पूरा नहीं हुआ था। चार साल बाद, उनकी भूख और दृढ़ संकल्प ने उन्हें एक बार फिर ओलंपिक पोडियम पर खड़ा कर दिया, और इस बार सिल्वर मैडल के साथ। इसके साथ ही सुशील कुमार दो व्यक्तिगत पदक जीतने वाले पहले और एकमात्र भारतीय बन गए। “जब मैंने बीजिंग में कांस्य पदक जीता, तब भी मुझे लगा कि मेरे पास हासिल करने के लिए बहुत कुछ है’’।

लंदन ओलंपिक का सफ़र
अपनी झोली में बीजिंग 2008 खेलों का कांस्य पदक डालने के बाद सुशील कुमार ने पहले ही देश में प्रमुख 66 किग्रा फ्रीस्टाइल पहलवान के रूप में खुद को स्थापित कर लिया था। उनके प्रदर्शन ने उनकी स्थिति को ही बदल दिया।भारतीय पहलवान ने 2010 के अविश्वसनीय प्रदर्शन किया, जहां उन्होंने एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और नई दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के साथ-साथ मॉस्को में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। हालांकि, कंधे की चोट के कारण उनकी ये लय टूट गई और एक समय लंदन के लिए सुशील कुमार का ओलंपिक सपना अधूरा लगने लगा।

भारतीय पहलवान ने याद करते हुए कहा, “मेरा दाहिना कंधा घायल हो गया था और एक समय ऐसा भी था जब मेरी क्वालिफिकेशन दांव पर थी। यहां तक कि मैंने एक क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट भी मिस कर दिया।”

हालांकि, सुशील कुमार ने लंदन में अपने टिकट बुक करने के लिए लड़ाई लड़ी और उन्होंने चीन में एक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीता।

लंदन में रचा इतिहास बने डबल ‘ओलंपिक मेडलिस्ट’
दर्द को हराने के बाद 2012 के लंदन समर ओलंपिक के लिए सुशील कुमार के रास्ते में एक और अड़चन आ गई, जब वेट कैटेगरी एक मुद्दा बन गया। वो अपनी कैटेगरी से छह किलो अधिक थे और लंदन खेलों के वेट-इन शेड्यूल होने से पहले उस कैटेगरी में जाने लिए उनके पास सिर्फ 10 दिन थे। सुशील कुमार ने अपने शरीर को पूरी तरह कंट्रोल में रखा। उन्होंने खुद को भूखा रखा और अपने कार्डियो अभ्यास करते समय भारी कपड़े पहने लेकिन अपने पहले बाउट से एक रात पहले, इसने बदतर स्थिति को मोड़ लिया। भारतीय पहलवान ने इलेक्ट्रोलाइट फेंके जो उन्हें टीम के डॉक्टर ने दिए थे, जिससे उनके पूरे शरीर में मांसपेशियों में खिचाव आ गया।

तीन-पुरुष भारतीय पहलवानों के दल और लंबे समय तक कोच रहे यशवीर सिंह ने उनकी मालिश की और उन्हें हाइड्रेटेड रखा।

रास्ता और कठिन तो तब दिखाई देने लगा, जब पता चला कि पहले दौर में उनके प्रतिद्वंद्वी तुर्की के बीजिंग के 2008 के स्वर्ण पदक विजेता रमजान साहिन हैं। केवल तीन घंटे की नींद के बाद उनके साथ कुश्ती करना एक मुश्किल काम लग रहा था। फिर भी, सुशील कुमार उन्हें हराकर आगे बढ़ने में कामयाब रहे। उन्होंने पहले दौर में जीत हासिल की लेकिन भारतीय पहलवान ने अपने सारे अनुभव का इस्तेमाल ओलंपिक चैंपियन को हराने के लिए एक कर दिया था।

बाउट में वो इतने थक गए कि वो हांफने लगे और सुशील कुमार थकावट के कारण चेंजिंग रूम में गिर गए, जिससे कुश्ती दंगल चिंतित हो गया। सभी ने सुशील को उठाने की पूरी कोशिश की। “मैं इतना थक गया था कि मैं अपनी उंगलियों को हिला नहीं सकता था। स्वाभाविक रूप से, हर कोई चिंतित था, और यहां तक कि योगेश्वर दत्त भी थे, जो मुझे उठाने की पूरी कोशिश कर रहे थे।”

सुशील कुमार ने क्वार्टर फाइनल में आसानी से उज्बेकिस्तान के इख्तियार नवरुजोव को हरा दिया और जब सेमीफाइनल का समय आया, तब तक सुशील कुमार अपने अच्छी लय को हासिल कर चुके थे। कज़ाख़्तान के अज़ुरेख तनातरोव उनके रास्ते में अगली बाधा थे। सुशील कुमार ने कज़ाखस्तानी पहलवान को हराने लिए जिस तरह की कुश्ती लड़ी वो काबिल-ए-तारीफ़ थी। लेकिन बाद में भारतीय पहलवान पर उनके कान काटने का आरोप लगा। तनातरोव के कान से खून बह रहा था, लेकिन कज़ाख पहलवान की टीम ने रिव्यू का विकल्प नहीं चुना और भारतीय पहलवान फाइनल में पहुंच गए और दो ओलंपिक पदक जीतने वाले एकमात्र भारतीय के रूप में इतिहास की पन्नों में दर्ज हो गए।

फाइनल से पहले, सुशील कुमार ने एक बेल्ट बांध ली और छह बार वॉशरूम गए। इससे उन्हें वो आराम नहीं मिला, जो उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ कुश्ती के लिए चाहिए था। उनके शरीर ने आखिरकार फाइनल में साथ छोड़ दिया, जहां जापान के व्यक्ति ततुहिरो योनेमित्सु ने भारतीय पहलवान को एक भी राउंड जीतने नहीं दिया। सुशील कुमार ने कहा, “कुश्ती में खेल उतना नहीं होता जितना हम सोचते हैं।”

“जापानी पहलवान भी बहुत अच्छी तरह से तैयार हो गए थे और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि कहीं न कहीं यह मेरी गलती थी। मेरी शुरुआत अच्छी नहीं रही।”

सुशील कुमार का सिल्वर , लंदन खेलों में भारत का छठा पदक था। ये ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। सुशील ने कहा, “मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने तरीके से अपने देश की सेवा कर रहा हूं और इस खुशी के पल में पूरा देश मेरे साथ है।”

सुशील कुमार 2012 के ओलंपिक में भारत के ध्वजवाहक थे और उन्होंने उस समय के साथ न्याय किया। उन्होंने दिखाया कि धैर्य और दृढ़ संकल्प वास्तव में क्या होती है। “मुझे वास्तव में बाद में इस तथ्य के बारे में पता चला कि मैं पहला भारतीय हूं जिसने अपने देश के लिए दो व्यक्तिगत पदक जीते हैं। इससे मुझे बहुत गर्व हुआ कि मैं अपने देश के लिए कुछ अच्छा कर सका हूं।”

टोक्यो ओलंपिक पर है नज़र – ‘आखिरी ओलंपिक होगा’
कोरोनोवायरस महामारी के कारण ओलंपिक एक साल आगे बढ़ने से दो बार के ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार को एक और अवसर दिया। 2016 में मौका गँवाने के बाद, वह अपने तीसरे ओलंपिक पदक पर नजर गड़ाए हुए हैं, वह अब 2021 ओलंपिक के लिए अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं। लेकिन यह उनका आखिरी ओलंपिक होगा।

उनके कोच सतपाल सिंह ने खुलासा किया है कि यह सुशील का आखिरी ओलंपिक होगा। “अगर सुशील इसे बनाता है, तो टोक्यो उसका आखिरी ओलंपिक होगा”

“एक एथलीट के जीवन में एक वर्ष बहुत लंबा होता है, इसलिए टोक्यो खेलों में एक साल की देरी से कुछ फर्क पड़ेगा। लेकिन सुशील बहुत अनुशासित है। अब भी वह अपनी ताकत और सहनशीलता बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। वह जानता है कि टोक्यो उसका आखिरी मौका है, और भारत के लिए स्वर्ण जीतने की उसकी दिली इच्छा है” कोच सतपाल ।

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