पिता का अधूरा सपना बेटी ने महज 16 साल की उम्र में ओलंपिक मैडल जीतकर किया पूरा

By   - 29/06/2020

मूल रूप से वे हरियाणा के झज्जर के ढांढलान (धान्धलान) गाँव से ताल्लुक रखने वाली सिमरन का परिवार अभी दिल्ली के रोहिणी में रहता है। रेसलर सिमरन भारत के फ्रीस्टाइल महिला वर्ग की उभरती हुए पहलवानों में से एक है 16 वर्ष की उम्र में सिमरन ने युथ ओलंपिक गेम्स में सिल्वर पदक जीतकर ना केवल अपने पिता का बल्कि पुरे देश का सिर गर्व से ऊँचा किया था। सिमरन युथ ओलंपिक में मेडल जीतने वाली भारत की दूसरी महिला पहलवान है।

रेसलिंग की शुरुआत
सिमरन के पिता खुद एक पहलवान थे। माँ-बाप की बड़ी आस थी कि देश के लिए मेडल जीतें, पर एक चोट की वजह से ऐसा हो नहीं पाया। जब सिमरन हुई तब से पिता की मन में बड़ी इच्छा थी कि उसको खेलों में आगे बढ़ाना है। जो वो ना कर पाए पर बेटी करेगी। लेकिन सिमरन के खेलो के करियर की शुरुआत रेसलिंग से नहीं बल्कि जिमनास्टिक और बैडमिंटन से हुई आगे बढ़ने के लिए उन्हें काफी दिक्कतें आने लगी कभी उनके साथ बेमानी होती तो कभी सिमरन के साथ कोच का रवैया ठीक नहीं होता था इसलिए सिमरन को जिमनास्टिक और बैडमिंटन छोड़ना पड़ा जिसकी वजह से बाद में उन्होंने कुश्ती को चुना। राजेश अहलावत बताते हैं,“मैंने सिमरन से पूछा कि जिमनास्टिक और बैडमिंटन के अलावा कोई और खेल है क्या, जो वह करना चाहती है तो उसने बड़े जोश से कहा ‘कुश्ती’!”

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जब दोनों खेलो में कुछ नहीं हुआ तो इसे किस्मत का इशारा समझकर राजेश अहलावत ने फैसला किया कि वे सिमरन से ‘कुश्ती’ ही करवाएंगे। उन्होंने सिमरन से कहा कि कुश्ती हमारा अपना खेल है और इस पर हमारा बस है।

“शुरू में परिवार वालों ने थोड़ा ऐतराज जताया पर मैं बिल्कुल इस बात पर डटा रहा कि सिमरन अब कुश्ती ही करेगी। मुझे जो कुछ भी आता था, मैंने धीरे-धीरे सिमरन को सिखाया। लगभग 12 साल की उम्र में सिमरन ने कुश्ती करना शुरू किया और उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा,” राजेश अहलावत ने बताया।

पहले तो सिमरन के पिता ने ही उन्हें ट्रेनिंग दी। फिर उन्होंने रोहिणी के पास ही बुद्ध विहार में स्थित तेज सिंह अखाड़ा में जाना शुरू किया। यहाँ पर उन्हें प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी जाने लगी। इसके अलावा राजेश अहलावत भी उसे अलग से प्रैक्टिस करवाते।

साल 2014 से हुए मैडल जीतने की शुरुआत
ट्रेनिंग शुरू होने के कुछ वक़्त में ही सिमरन ने अपना पहला राष्ट्रीय मेडल साल 2014 में सब-जूनियर और जूनियर केटेगरी टूर्नामेंट, श्रीनगर में जीता। इसके बाद उन्होंने चीन में भी एक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता। राष्ट्रीय स्तर पर कई बार टूर्नामेंट जीतने के अलावा सिमरन ने दो बार एशियाई चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता है। वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रोंज मेडल भी जीता। इन सभी उपलब्धियों के साथ कैडेट लेवल पर सिमरन आज देश के कामयाब पहलवानों में से एक हैं।

प्रैक्टिस के लिए पार्टनर नहीं मिलते थे
सिमरन की राह में चुनौतियों की कोई कमी नहीं रही। राजेश अहलावत ने बताया कि बहुत बार सिमरन को साथ में प्रैक्टिस करने के लिए भी कोई नहीं मिलता था। ऐसे में उन्होंने कई बार दूसरे बच्चों को उसके साथ प्रैक्टिस करने के लिए कभी जूस पिलाया तो कभी पैसे दिए। बहुत बार तो उन्होंने खुद सिमरन के साथ प्रैक्टिस की।

दंगलों में लडको को धूल चटाई
नेशनल टूर्नामेंट और इंटरनेशनल चैंपियनशिप के अलावा सिमरन ने देसी दंगलों में भी बहुत नाम कमाया। उन्होंने न केवल लड़कियों बल्कि लड़कों के साथ भी दंगल किये हैं और उन्हें हराया। सिमरन के इस कामयाबी के सफ़र में उनके पिता हर कदम पर साथ रहे। प्रैक्टिस से लेकर टूर्नामेंट तक, हर जगह वे सिमरन के साथ गये।

परिवार का सपोर्ट मिला
राजेश अहलावत ने बताया कि अभी भी उनका संयुक्त परिवार है। वे खुद जब सिमरन के साथ व्यस्त थे तो उनके छोटे भाई ने घर की पूरी ज़िम्मेदारी सम्भाली। सिमरन के दादा-दादी ने भी उनके सफ़र में पूरा सहयोग किया है। एक किसान परिवार होने के नाते, जो भी उपज होती है, उसी में उनका खर्च चलता है।

फिल्मो में काम किया
छोटी-सी उम्र में ही सिमरन का रिश्ता फिल्मों से भी जुड़ा। सिमरन को आमिर खान की दंगल फिल्म में रोल करने का मौका मिला था पर सिमरन को उस वक़्त दस दिनों में ही एशियाई चैंपियनशिप के लिए जाना था। सिमरन ने अपने खेल के आगे हर चीज़ को पीछे छोड़ दिया और उन्होंने चैंपियनशिप जीती भी। इसके बाद सिमरन ने सलमान खान के साथ सुल्तान फिल्म में काम किया है।

कोच का सपना पूरा किया
सिमरन अहलावत को इस मुकाम तक पहुँचाने में उनके पिता और परिवार के अलावा और भी बहुत से नाम हैं, सिमरन आज भी तेज सिंह आखाड़े में प्रैक्टिस करती हैं और यहाँ कोच एकता सुहाग उन्हें सिखाती हैं। राजेश अहलावत ने बताया कि पहले एकता के पति कोच रिकास सुहाग सिमरन को सिखाते थे।

रिकास सुहाग को सब रिक्की कोच के नाम से जानते हैं। सिमरन के साथ उन्होंने बहुत मेहनत की। यहाँ तक कि प्रैक्टिस के दौरान वे खुद सिमरन के लिए खाना पकाते और उसे खिलाते थे। सिमरन के प्रति रिक्की कोच का अटूट विश्वास था कि एक दिन वह देश के लिए मेडल जरुर लाएगी। कुछ समय पहले रिक्की कोच का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। इस घटना का सिमरन पर भी असर हुआ। पर सिमरन ने अपने कोच के सपने को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की और युथ ओलंपिक में जीते अपने मेडल को रिक्की कोच को समर्पित किया। रिक्की कोच के जाने के बाद उनकी पत्नी एकता ने तेज सिंह अखाड़ा में लड़कियों को सिखाने की ज़िम्मेदारी उठाई।

इसके अलावा पद्मश्री पद्मभूषण महाबली सतपाल सिंह के संरक्षण में चल रहा तेज सिंह अखाड़ा सिमरन जैसे ही बहुत से पहलवानों को उनकी मंज़िल तक पहुंचने के लिए दिशा दे रहा है। राजेश अहलावत ने कहा कि तेज सिंह अखाड़ा बिना किसी फीस के नि:स्वार्थ भाव से पहलवानों की मदद कर रहा है। अखाड़े के संचालक संदीप पहलवान और आशीष पहलवान यहाँ पर सभी बच्चों के लिए हर एक सुविधा मुहैया करवाते हैं।

सुशील कुमार को अपनी प्रेरणा मानने वाली सिमरन ने आज न केवल अपने परिवार का सपना पूरा किया है बल्कि वे बहुत-सी लड़कियों के लिए प्रेरणा है। इसके बाद अब उनका पूरा फोकस ओलंपिक और वर्ल्ड चैंपियनशिप पर है।

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